जिंदगी की राहों में शायरी

थोड़ी सी चालाकियाँ, मुझे भी सीखा दे ऐ जिंदगी, मासूमियत मुझे इस दौर में, कुछ भारी पड़ रही है!!

छोड़ दी वो गलियां जहाँ दर्द के, सिवा कुछ नहीं था…

मौत की दुआए मांगी थी, सुबह आँखे खुली, रूह ने कहा जा जी ले जिंदगी….

बहुत कुछ खोया, दर्द-ए-इश्क़ में “फकीरा” चला जा यहाँ से अपनी, पुरानी महेफिल में…

देख जिंदगी कितनी रोनक हो गई “फकीरा” इश्क़, मोहब्बत, दर्द से नाता तोड़ दिया…

बेहतर थी जिंदगी की राहे, ना कोई गम, ना कोई शिकवा, सुकून से भरी, बेहद खुशियां, उन राहो पर मोड़ आया, टूट कर बिखर गई जिंदगी…

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