प्यारी माँ पर शायरी

मांगने पर जहाँ पूरी हर मन्नत होती है माँ के पैरों में ही तो वो जन्नत होती है

गिन लेती है दिन बगैर मेरे गुजारें हैं कितने भला कैसे कह दूं कि माँ अनपढ़ है मेरी

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती बस एक मां है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

मैं रात भर जन्नत की सैर करता रहा यारों सुबह आँख खुली तो सर माँ के कदमों में था

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है

एक मुद्दत हुई मेरी मां नहीं सोई तबिश मैंने एक बार कहा था कि मुझे डर लगता है

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